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Coronavirus caused lockdown in India

चीन की एक गलती ने ली लाखों लोगों की जान

Coronavirus caused lockdown in India

क्या है चीन का , सच नावेल कोरोना वायरस के बारे में। ?

कोरोना वायरस की खबर ने दुनिया भर को डरकर रख दिया है। यह एक ऐसा संक्रमक रोग है , जो एक दूसरे के संपर्क में आने पर बहुत तेजी से लोगो को अपनी चपेट में लेता है , और यह इतना घातक है की इस के संपर्क में जो भी होते है. यह उसकी जान तक ले लेता है : Coronavirus caused lockdown in India –

कोरोना वायरस – कोरोना वायरस संबंधित है , यह ऐसे वायरस का एक समूह है, जो कि स्तनधारियों और पक्षियों में बीमारियों का कारण बनता है। और वह मनुष्यों में, कोरोनाविरस श्वसन पथ के संक्रमण का कारण बनता है जो हल्के हो सकते हैं, जैसे कि आम सर्दी के कुछ मामले (अन्य संभावित कारणों में, मुख्य रूप से राइनोवायरस), और अन्य जो कि घातक हो सकते हैं, जैसे कि सार्स, मर्स और सीओवीआईडी ​​-19 . अन्य प्रजातियों में लक्षण भिन्न होते हैं. मुर्गियों में, वे एक ऊपरी श्वसन पथ की बीमारी का कारण बनते हैं, जबकि गायों और सूअरों में वे दस्त का कारण बनते हैं। मानव कोरोनावायरस संक्रमण को रोकने या उसका इलाज करने के लिए अभी तक टीके या एंटीवायरल दवाएं नहीं बना पाया हैं।

चीन के वैज्ञानिकों द्वारा यह बताया गया है , कि कोरोना वायरस और सार्स वायरस की एक जैसी समानता देखने को मिली थी. सन 2002 और 2003 सार्स वायरस ने महामारी ला दी थी। सार्स वायरस झींकने वा झूने से फैलता है। उस समय भी चीन ने इस घातक संक्रामक सार्स वायरस की खबर से लोगो तक पहुंचने नहीं दी। और चीन ने एक बार फिर से वही गलती को दोहराया। इस बार तो सार्स वायरस से भी ज्यादा खतनाक वायरस के बारे में बताने के बजाय फिर से उसे छुपाने लगे। मगर हर बार की तरह इस बार चीन इस वायरस को नहीं छुपा सके। क्योंकि यह वायरस पहले के वायरस से इतना अधिक खतरनाक साबित हुआ की यह बहुत कम ही समय में इतने ज्यादा लोगो की जान ले चुका था। कि चीन को अब इसे छुपाना और भी मुश्किल होता जा रहा था।

कब, कहाँ और कैसे पैदा हुआ कोरोना वायरस:- सन 2019 दिसंबर के पहले हफ्ते से ही दुनिया में फैलने लगा था , कोरोना वायरस सुरु में ही इस वायरस के द्वारा लोगो की जान भी जा चुकी थी। फिर दिसम्बर के आखिरी हफ्ते में मरीजों की संख्या 7 हो गयी। डॉक्टर ली वेलेयांग ने ही सबसे पहले इस वायरस से ग्रसित मरीज इनके हॉस्पिटल में आये। तब डॉक्टर ली वेलेयांग ने इस वायरस के बारे में सोशल मिडिया के द्वारा बताया था। मगर कुछ दिनों बाद ही डॉक्टर ली की भी इस कोरोना जानलेवा वायरस से इनकी मौत ही गयी। चीन की सरकार ने डॉक्टर ली को यह खबर गुप्त रखने को ही बोला था। मगर डॉक्टर ली जानते थे की या वायरस किसी से छुपा ने जैसा नहीं है। यह वायरस एक बहुत खतरनाक जान लेवा वायरस है।

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इस बारे में चीन का यह कहना है , चीन के वूहान नामक शहर में एक लैब है. जहाँ चीन और जापानी दोनों देश के वैज्ञानिक मिलकर काम करते है . चीन उस लैब में जैविक हथियार बनता था। ऐसी खबर आई। मगर इस बात को चीनी सरकार अभी तक मान ने इंकार करती आयी है , कि वह जैविक हथियार भी बनवाने का काम करती है।

इस बारे में चीन का यह कहना है , चीन के वूहान नामक शहर में एक लैब है। जहाँ चीन कम्युनिटी सरकार चोरी छुप के वैज्ञानिक मिलकर उस लैब में काम करते थे। चीन उस लैब में जैविक हथियार बनता था। ऐसी खबर आई। मगर इस बात को चीनी सरकार अभी तक मान ने इंकार करती आयी है , कि वह जैविक हथियार भी बनवाने का काम करती है। चीन के वूहान की लैब के वैज्ञानिकों का कहना यह है कि वो लोग इबोला , निपाह और सार्स जैसे घातक वायरसो पर वे रिसर्च कर रहे थे। रिसर्च के दौरान ही वैज्ञानिकों को अपने मइक्रोस्कोप में कोरोना वायरस के लझण नज़र आये। मेडिकल हिस्टरी में ऐसा वायरस पहली बार देखा गया। इसके जैनेटिक सीक्यूवेसशन को देखने से पता चलता है , कि यह चमगादड़ के करीबी हो सकता है।

( ऐसा शक हुआ। )

चीन का कहना यही है की यह चीन के वुहान की फिश मार्किट से फैला।

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कोरोना संकट पर मोदी सरकार ने क्या पैकेज लागू किये है ?

कोरोनवायरस: मोदी सरकार लोगों की मदद के लिए आर्थिक पैकेज पर काम कर रही है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार लोगों की मदद के लिए आर्थिक पैकेज पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार पैकेज पर प्राथमिकता से काम कर रही है और जल्द ही इसकी घोषणा करेगी।

वित्त मंत्री ने माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट, ट्विटर पर रहस्योद्घाटन किया, जबकि यह घोषणा करते हुए कि वह आज दोपहर मीडिया को सांविधिक और नियामक अनुपालन मामलों पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित करेंगे।

लोक डाउन होने से वायुमंडल पर क्या प्रभाव पड़ा?

भारत में लोक डाउन होने हमारे वातावरण पर बहुत ही ज्यादा प्रभाव पड़ा। चलती फिरती दुनिया इतना ज्यादा वायु प्रदुषण फैला हुआ था। कि साँस लेने में तकलीफ होने लगी थी। मगर पिछले कुछ दिनों से वायु में थोड़ी शुद्ता आ गयी है। जो कि बहुत अच्छी बात है। पूरे वायु मंडल के लिए।

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पृथ्वी के वायुमंडल पर मानव प्रभाव –

कीचड़ में खेल रहे बच्चों की तरह, मनुष्यों ने पृथ्वी के वातावरण और पर्यावरण को कई तरीकों से गंदा किया है। औद्योगिक क्रांति ने प्रौद्योगिकी और विकास में भारी प्रगति की, लेकिन इसके कारण वायु प्रदूषण और प्रदूषण हवा में जारी हो गए। पृथ्वी के वायुमंडल और जलवायु पर मानव प्रभाव आज पारिस्थितिक राजनीति में एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है, और एक ऐसी समस्या को प्रस्तुत करता है जो वर्षों तक ग्रह को खतरा दे सकता है।

ग्रीन हाउस गैसें:

ग्रीनहाउस गैसों, जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन, ग्रीनहाउस प्रभाव में योगदान करती हैं, जिससे वातावरण में गर्मी पैदा होती है, जिससे महासागरों और ग्रह पर तापमान बढ़ता है। अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन के अनुसार, वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता 1750 के बाद से 38 प्रतिशत बढ़ गई है, जबकि इसी अवधि के दौरान मीथेन सांद्रता 148 प्रतिशत हो गई है। अधिकांश वैज्ञानिक इसे जीवाश्म ईंधन के व्यापक दहन के लिए बढ़ाते हैं।

ओजोन परत नष्ट:

ओजोन परत, वायुमंडल का एक सुरक्षात्मक आवरण, पराबैंगनी विकिरण को अवरुद्ध करने में मदद करता है। 1985 के मई में, ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन के अणुओं को नष्ट कर रहा था। समस्या के अध्ययन ने क्लोरोफ्लोरोकार्बन और अन्य ओजोन-क्षयकारी रसायनों के विनाश का पता लगाया और 1987 में, दुनिया भर के देशों ने सीएफसी के उपयोग को बंद करने के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए। सीएफसी में आमतौर पर एयरोसोल स्प्रे में पाए जाने वाले रसायन, एयर कंडीशनर में इस्तेमाल होने वाले रेफ्रिजरेंट और फोम और अन्य पैकिंग सामग्री के लिए उड़ाने वाले एजेंट शामिल होते हैं।

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वायु प्रदुषण :

वायु प्रदूषण के माध्यम से मानव स्थानीय स्तर पर वातावरण को भी प्रभावित करता है। जीवाश्म ईंधन दहन द्वारा जारी यौगिक अक्सर जमीनी स्तर पर ओजोन अणु बनाते हैं। इससे लोगों को सांस लेने में कठिनाई का खतरा है, और लंबे समय तक जोखिम के साथ फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है। ईपीए नियमित रूप से प्रभावित क्षेत्रों के लिए वायु गुणवत्ता अलर्ट प्रकाशित करता है, और उन लोगों को साँस लेने में कठिनाई या पर्यावरण संवेदनशीलता के साथ सलाह देता है जहां ओजोन सांद्रता सबसे अधिक है।

दीर्घकालिक प्रभाव:

कुछ रसायनों पर प्रतिबंध लगाने या हवा को साफ करने के बाद भी, वातावरण को ठीक करने में कुछ समय लगेगा। भले ही 1985 में सीएफसी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन उनके अणु वातावरण में लंबे समय तक रहते हैं। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण का अनुमान है कि ओजोन परत में छेद को गायब होने में 50 साल लग सकते हैं, बशर्ते ओजोन में कोई नया खतरा न आए।

उसी तरह, पृथ्वी का पारिस्थितिकी तंत्र बहुत धीरे-धीरे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है, जिसका अर्थ है कि प्रमुख वायुमंडलीय परिवर्तनों को रोकने के लिए CO2 उत्पादन स्तर को स्थिर करना भी पर्याप्त नहीं हो सकता है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज के अध्ययन से पता चलता है कि भले ही मनुष्य कार्बन उत्पादन के स्तर में 50 प्रतिशत की कटौती कर दे, लेकिन पृथ्वी को अभी भी अगली शताब्दी में वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड में शुद्ध वृद्धि के कारण पहले से ही गति में बदलाव दिखाई देगा।

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